त्योहार · मार्गशीर्ष पूर्णिमा
दत्तात्रेय जयंती 2026
मार्गशीर्ष पूर्णिमा की शाम दत्त जन्म होता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक ही रूप में: गुरुओं के गुरु दत्तात्रेय।
तारीख, तिथि और समय
समय इंदौर के अनुसार। ऐप में आपके शहर का समय।
शहर के अनुसार तारीख
यह तारीख सभी शहरों में एक ही है।
अगले साल, 2027
संक्षिप्त जानकारी
- अन्य नामदत्तात्रेय जयंती, दत्त जन्मोत्सव
- कहाँमहाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गुजरात
- किसकी पूजादत्तात्रेय
- एक पंक्ति मेंवह दिन जब ऋषि अत्रि और अनसूया के घर दत्तात्रेय का जन्म हुआ।
दत्तात्रेय जयंती, थोड़ा विस्तार से
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पर्व के बारे में
दत्तात्रेय में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों हैं, इसलिए मूर्ति के तीन मुख और छह हाथ हैं। दत्त का अर्थ है दिया हुआ: देवताओं ने स्वयं को अनसूया को दिया। अत्रि के पुत्र होने से आत्रेय।
दत्त को गुरुओं का गुरु माना जाता है। भागवत में कथा है कि उन्होंने पृथ्वी, जल, मधुमक्खी, यहाँ तक कि एक बच्चे से भी सीखा: कुल चौबीस गुरु। सीख सीधी है: जहाँ से भी सीखने को मिले, सीखिए।
उनके साथ एक गाय और चार कुत्ते दिखते हैं। गाय पृथ्वी की और चार कुत्ते चार वेदों के प्रतीक माने जाते हैं।
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अनसूया की कथा
ऋषि अत्रि की पत्नी अनसूया अपने तप और सतीत्व के लिए तीनों लोकों में जानी जाती थीं। उनकी परीक्षा लेने ब्रह्मा, विष्णु और महेश युवा ऋषियों के वेश में आश्रम आए, जब अत्रि स्नान के लिए गए थे।
अनसूया ने उन्हें पहचान लिया। उन्होंने उन पर जल छिड़का और तीनों छोटे बच्चे बन गए। फिर माँ की ममता से उन्हें भोजन कराया। तीनों की पत्नियों के विनती करने पर उन्होंने उन्हें फिर से अपना रूप लौटा दिया।
तीनों प्रसन्न हुए और वर माँगने को कहा। अनसूया ने माँगा: आप मेरी संतान बनकर जन्म लें। तीनों का अंश एक होकर उनके गर्भ से दत्तात्रेय के रूप में जन्मा, मार्गशीर्ष पूर्णिमा को।
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महाराष्ट्र में और दूसरी जगह
जयंती से सात दिन पहले कई घरों में गुरुचरित्र का पारायण होता है, जो जयंती के दिन पूरा होता है। कोई दत्त बावनी या दत्त स्तोत्र का पाठ करते हैं।
शाम को, जन्म के समय, दत्त का पालना झुलाते हैं, पालने के गीत गाते हैं और प्रसाद में सुंठवड़ा बाँटते हैं।
गाणगापुर, नरसोबाची वाडी, औदुंबर और आंध्र का पीठापुरम, इन दत्त क्षेत्रों में बड़ा उत्सव होता है। श्रीपाद श्रीवल्लभ, नृसिंह सरस्वती और अक्कलकोट के स्वामी समर्थ को दत्तावतार माना जाता है, इसलिए उनके मठों में भी आज भीड़ रहती है।
पूजा कैसे करें?
संक्षेप में: हफ़्ते भर गुरुचरित्र, शाम को दत्त जन्म और पालना, फिर आरती, प्रसाद और अन्नदान।
- 1गुरुचरित्र का पारायण करते हों, तो हफ़्ते भर पहले शुरू करें, ताकि जयंती को पूरा हो।पाठ के नियम हर घर में अलग होते हैं: कई लोग सादा भोजन करते हैं और रोज़ एक ही समय पढ़ते हैं।
- 2सुबह जल्दी स्नान करें, और व्रत या दिन में एक बार सादा भोजन तय करें।बीमार, गर्भवती या बुज़ुर्ग हों, तो सादा भोजन करें।
- 3साफ़ चौकी पर दत्त की प्रतिमा रखें, और दीया और अगरबत्ती जलाएँ।प्रतिमा न हो तो दत्त की तस्वीर भी चलती है।
- 4फूल, तुलसी या बेलपत्र, अक्षत, चंदन और हल्दी चढ़ाएँ।दत्त में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों हैं, इसलिए तुलसी और बेलपत्र दोनों चलते हैं।
- 5शाम को, प्रदोष काल में, दत्त जन्म मनाएँ: बाल रूप दत्त को पालने में रखकर पालना गाएँ।आपके शहर का प्रदोष काल का समय ऊपर दिया है। पालना न हो तो छोटा झूला या चौकी भी चलेगी।
- 6दूध या गुड़ की मिठाई और फलों का नैवेद्य चढ़ाएँ। कई मराठी घरों में सुंठवड़ा दिया जाता है।नैवेद्य पहले भगवान को, फिर सबको।
- 7आरती करें, भजन गाएँ, या दत्त बावनी या दत्त स्तोत्र का पाठ करें।गुजराती घरों में दत्त बावनी अक्सर पढ़ी जाती है; मराठी घरों में दत्त की आरती गाई जाती है।
- 8किसी ज़रूरतमंद को, या गाय और कुत्ते को भोजन दें, और प्रसाद लेकर व्रत खोलें।दत्त के साथ गाय और कुत्ते होते हैं, इसलिए उन्हें भोजन देना शुभ माना जाता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दत्त जन्म किस समय मनाया जाता है?
शाम को, प्रदोष काल में: माना जाता है कि दत्त का जन्म शाम को हुआ था। आपके शहर का समय ऊपर दिया है। मंदिरों में उसी समय जन्म का कीर्तन और पालना होता है।
गुरुचरित्र पारायण के नियम क्या हैं?
जयंती से पहले के सात दिन पाठ, और जयंती को उसका समापन। पारायण के नियम कड़े होते हैं, और हर घर में अलग: कई लोग सादा भोजन करते हैं और रोज़ एक ही समय पढ़ते हैं। शंका हो तो घर के बड़ों से या दत्त मठ में पूछें।
सुंठवड़ा क्या है?
सोंठ, सूखे नारियल और चीनी या मिश्री का मिश्रण। जन्म के उत्सव पर, जैसे राम नवमी और जन्माष्टमी पर, वैसे ही दत्त जयंती पर भी कई घरों में यह प्रसाद होता है।
घर पर पूजा के बजाय मंदिर जाएँ तो?
ज़रूर। दत्त मंदिरों में आज जन्म का कीर्तन, भजन, पालकी और अन्नदान होता है। भीड़ होती है, इसलिए जल्दी जाएँ।
बीमारी, गर्भावस्था या बुढ़ापे में व्रत रखें?
सेहत पहले। सामान्य भोजन करें, और पूजा, पालना और आरती मन से करें। शंका हो तो डॉक्टर की सलाह लें।
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