व्रत · आश्विन कृष्ण एकादशी
रमा एकादशी 2026
आश्विन कृष्ण एकादशी (उत्तर भारत में कार्तिक कृष्ण) रमा एकादशी है, दिवाली के ठीक पहले। रमा लक्ष्मी का नाम है, और लक्ष्मी पूजा से पहले का यह आख़िरी व्रत है!
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संक्षिप्त जानकारी
- अन्य नामरंभा एकादशी
- कहाँपूरा भारत; उत्तर भारत में कार्तिक कृष्ण एकादशी के रूप में
- किसकी पूजाविष्णु; महाराष्ट्र में विठ्ठल
- एक पंक्ति मेंदिवाली से पहले की एकादशी: श्रद्धा से रखे व्रत का फल टिकता है, यह कथा।
रमा एकादशी, थोड़ा विस्तार से
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पर्व के बारे में
हर पखवाड़े एकादशी आती है, और हर एक का अपना नाम और अपनी कथा होती है। आश्विन के कृष्ण पक्ष की यह एकादशी रमा है, और ठीक इसके साथ वसुबारस और दिवाली।
व्रत हमेशा जैसा: एकादशी को अन्न नहीं, और पारण द्वादशी को सूर्योदय के बाद।
इस एकादशी की कथा एक बात पर ज़ोर देती है: व्रत सिर्फ़ पेट का नहीं, मन का होता है। मन लगाकर किया छोटा व्रत भी बड़ा फल देता है, और वह फल किसी और को भी दिया जा सकता है।
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चंद्रभागा और शोभन
राजा मुचुकुंद के राज्य में एकादशी को कोई भोजन नहीं करता था। उनकी बेटी चंद्रभागा के पति शोभन कमज़ोर थे, और वे एकादशी के दिन ही ससुराल पहुँचे। चंद्रभागा ने कहा, खाना हो तो यहाँ से चले जाइए। शोभन ने व्रत रखा, पर भूख-प्यास सही न गई, और द्वादशी के सूर्योदय पर उनकी मृत्यु हो गई।
व्रत के पुण्य से शोभन को मंदराचल पर्वत पर देवताओं की नगरी जैसा राज्य मिला। एक दिन सोमशर्मा नाम के ब्राह्मण वहाँ पहुँचे, और शोभन को देखकर दंग रह गए। शोभन ने कहा: मैंने वह व्रत श्रद्धा के बिना रखा था, इसलिए यह राज्य टिकेगा नहीं। चंद्रभागा को बताइए।
चंद्रभागा वामदेव ऋषि के आश्रम होकर शोभन तक पहुँचीं। उन्होंने कहा: आठ बरस की उम्र से मैंने हर एकादशी श्रद्धा से रखी है। वह सारा पुण्य मैं आपको देती हूँ। और शोभन का राज्य हमेशा के लिए स्थिर हो गया।
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महाराष्ट्र में और दूसरी जगह
वारकरी महीने की दोनों एकादशियाँ रखते हैं: व्रत, हरिपाठ, और गले में तुलसी की माला। रमा एकादशी भी इसमें शामिल है, दिवाली के पकवानों की तैयारी के बीच भी!
घर-घर दिवाली की हलचल होती है। कई घरों में आज तक दीये, आकाशकंदील और फराळ की तैयारी पूरी हो जाती है, और वसुबारस से दिवाली शुरू होती है। कुछ बरसों में वसुबारस और रमा एकादशी एक ही दिन पड़ती हैं।
उत्तर भारत में महीना पूर्णिमा को पूरा होता है, इसलिए वहाँ यही कार्तिक कृष्ण एकादशी है। नाम और कथा वही रहती है।
पूजा कैसे करें?
संक्षेप में: एक दिन पहले हल्का खाएँ, एकादशी को व्रत और नाम-स्मरण करें, और द्वादशी को सूर्योदय के बाद पारण करें।
- 1एक दिन पहले, दशमी को, हल्का भोजन करें।एक बार सादा भोजन काफ़ी है। रात को भारी कुछ न लें, ताकि एकादशी को पेट हल्का रहे।
- 2पूजा के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें।कई घरों में एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
- 3एकादशी की सुबह स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।मन में तय करें: निर्जला, सिर्फ़ पानी, फल और दूध, या एक बार फलाहार।
- 4विष्णु या विट्ठल की पूजा करें।दीया, अगरबत्ती, चंदन, फूल और तुलसी के पत्ते चढ़ाएँ। फल या दूध का नैवेद्य चढ़ाएँ।
- 5जो व्रत चुना है, उसे दिन भर निभाएँ।चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा और दालें न खाएँ। फलाहार पहले भगवान को चढ़ाएँ, फिर खाएँ।
- 6दिन भगवान के नाम में बिताएँ।हरिपाठ, विष्णु सहस्रनाम, भजन, या इस पेज पर उस एकादशी की कथा।
- 7शाम को फिर दीया जलाकर आरती करें।कई लोग रात भर भजन करते हुए जागरण करते हैं। अगले दिन काम हो तो थोड़ी देर काफ़ी है।
- 8द्वादशी को सूर्योदय के बाद व्रत खोलें।पंचांग में पारण का समय दिया हो तो उसी का पालन करें। पहले भगवान को नैवेद्य, फिर भोजन।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
व्रत में क्या खा सकते हैं?
यह आपके व्रत पर निर्भर है: कुछ नहीं, सिर्फ़ पानी, फल और दूध, या एक बार फलाहार। फलाहार में साबूदाना, समा के चावल, शकरकंद, आलू और मूँगफली चलते हैं। अनाज और दालें नहीं।
क्या पानी पी सकते हैं?
हाँ, अगर निर्जला व्रत नहीं है। सबसे कठिन व्रत में द्वादशी के सूर्योदय तक पानी भी नहीं होता, पर ज़्यादातर लोग हल्का व्रत रखते हैं।
व्रत कब खोलें?
द्वादशी को सूर्योदय के बाद, इसे पारण कहते हैं। अगर द्वादशी का पहला भाग, हरिवासर, सूर्योदय के बाद भी चल रहा हो, तो उसके ख़त्म होने तक रुकें। पंचांग में यह समय दिया होता है।
कभी-कभी एकादशी की दो तारीख़ें क्यों होती हैं?
जब कोई तिथि घटती या बढ़ती है, तो स्मार्त और भागवत (वारकरी) परंपराओं के नियम अलग हो जाते हैं, इसलिए दोनों की एकादशी अलग-अलग दिन पड़ सकती है। अपने घर की परंपरा का पालन करें।
किन्हें व्रत रखना ज़रूरी नहीं?
बीमार, गर्भवती महिलाएँ और जिन्हें स्वास्थ्य की कोई समस्या है, उन्हें व्रत रखना ज़रूरी नहीं, न छोटे बच्चों और बहुत बुज़ुर्गों को। वे दूध और फल लें और दिन प्रार्थना में बिताएँ। कोई बीमारी हो तो पहले डॉक्टर से पूछें।
अगर ग़लती से व्रत टूट जाए तो?
चिंता न करें। भगवान से क्षमा माँगें, बाक़ी दिन नाम-स्मरण में बिताएँ, और अगली एकादशी ठीक से रखें।
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