व्रत · भाद्रपद शुक्ल एकादशी
परिवर्तिनी एकादशी 2026
भाद्रपद शुक्ल एकादशी परिवर्तिनी एकादशी है: चातुर्मास में सोए विष्णु आज करवट बदलते हैं। और यह गणेशोत्सव के दिनों में आती है!
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संक्षिप्त जानकारी
- अन्य नामपार्श्व एकादशी, वामन एकादशी, जलझूलनी एकादशी, डोल ग्यारस
- कहाँपूरा भारत; राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में जलझूलनी के रूप में
- किसकी पूजावामन (विष्णु)
- एक पंक्ति मेंयोगनिद्रा में विष्णु आज करवट बदलते हैं, और वामन रूप की पूजा होती है।
परिवर्तिनी एकादशी, थोड़ा विस्तार से
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पर्व के बारे में
परिवर्तन यानी बदलाव। आषाढ़ी एकादशी से क्षीरसागर में सोए विष्णु आज एक करवट से दूसरी करवट लेते हैं, और कार्तिकी एकादशी तक सोते रहते हैं।
इसलिए आज वामन की पूजा। व्रत हमेशा जैसा, रात को जागरण, और हो सके तो दही-भात और थोड़ी चाँदी का दान, ऐसा बताया गया है।
आज की सीख: नींद में भी भगवान करवट बदलते हैं। हम भी साल के बीच रुककर देखें: कहाँ बदलाव चाहिए?
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बलि के घर विष्णु
प्रह्लाद के पोते बलि असुर होकर भी विष्णु के भक्त थे। उन्होंने इंद्र का स्वर्ग भी जीत लिया। तब इंद्र, देवता और ऋषि विष्णु के पास गए।
विष्णु वामन नाम के बटुक ब्राह्मण बनकर आए, और तीन पग के दान में बलि से तीनों लोक वापस ले लिए। बलि ने अपना वचन निभाया।
फिर विष्णु ने भी अपना वचन निभाया: मैं सदा तुम्हारे महल में रहूँगा। इस कथा के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी को ही बलि ने अपने घर में विष्णु की मूर्ति स्थापित की।
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महाराष्ट्र में और दूसरी जगह
महाराष्ट्र में यह एकादशी गणेशोत्सव के दिनों में आती है, अनंत चतुर्दशी से तीन दिन पहले। घर-घर गणपति, और उनके साथ व्रत और विठ्ठल की पूजा।
राजस्थान में यह जलझूलनी एकादशी है: उदयपुर में बालगोपाल की मूर्तियाँ शोभायात्रा में गणगौर घाट लाई जाती हैं और पिछोला झील के पानी पर झुलाई जाती हैं। चित्तौड़गढ़ के पास साँवलिया सेठ मंदिर में तीन दिन का बड़ा मेला लगता है।
मध्य प्रदेश में इसे डोल ग्यारस कहते हैं। भोपाल में इसी दिन से कई गणपतियों का विसर्जन शुरू होता है।
गुजरात में द्वारकाधीश मंदिर और स्वामीनारायण मंदिरों में शोभायात्रा निकलती है।
पूजा कैसे करें?
संक्षेप में: एक दिन पहले हल्का खाएँ, एकादशी को व्रत और नाम-स्मरण करें, और द्वादशी को सूर्योदय के बाद पारण करें।
- 1एक दिन पहले, दशमी को, हल्का भोजन करें।एक बार सादा भोजन काफ़ी है। रात को भारी कुछ न लें, ताकि एकादशी को पेट हल्का रहे।
- 2पूजा के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें।कई घरों में एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
- 3एकादशी की सुबह स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।मन में तय करें: निर्जला, सिर्फ़ पानी, फल और दूध, या एक बार फलाहार।
- 4विष्णु या विट्ठल की पूजा करें।दीया, अगरबत्ती, चंदन, फूल और तुलसी के पत्ते चढ़ाएँ। फल या दूध का नैवेद्य चढ़ाएँ।
- 5जो व्रत चुना है, उसे दिन भर निभाएँ।चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा और दालें न खाएँ। फलाहार पहले भगवान को चढ़ाएँ, फिर खाएँ।
- 6दिन भगवान के नाम में बिताएँ।हरिपाठ, विष्णु सहस्रनाम, भजन, या इस पेज पर उस एकादशी की कथा।
- 7शाम को फिर दीया जलाकर आरती करें।कई लोग रात भर भजन करते हुए जागरण करते हैं। अगले दिन काम हो तो थोड़ी देर काफ़ी है।
- 8द्वादशी को सूर्योदय के बाद व्रत खोलें।पंचांग में पारण का समय दिया हो तो उसी का पालन करें। पहले भगवान को नैवेद्य, फिर भोजन।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
व्रत में क्या खा सकते हैं?
यह आपके व्रत पर निर्भर है: कुछ नहीं, सिर्फ़ पानी, फल और दूध, या एक बार फलाहार। फलाहार में साबूदाना, समा के चावल, शकरकंद, आलू और मूँगफली चलते हैं। अनाज और दालें नहीं।
क्या पानी पी सकते हैं?
हाँ, अगर निर्जला व्रत नहीं है। सबसे कठिन व्रत में द्वादशी के सूर्योदय तक पानी भी नहीं होता, पर ज़्यादातर लोग हल्का व्रत रखते हैं।
व्रत कब खोलें?
द्वादशी को सूर्योदय के बाद, इसे पारण कहते हैं। अगर द्वादशी का पहला भाग, हरिवासर, सूर्योदय के बाद भी चल रहा हो, तो उसके ख़त्म होने तक रुकें। पंचांग में यह समय दिया होता है।
कभी-कभी एकादशी की दो तारीख़ें क्यों होती हैं?
जब कोई तिथि घटती या बढ़ती है, तो स्मार्त और भागवत (वारकरी) परंपराओं के नियम अलग हो जाते हैं, इसलिए दोनों की एकादशी अलग-अलग दिन पड़ सकती है। अपने घर की परंपरा का पालन करें।
किन्हें व्रत रखना ज़रूरी नहीं?
बीमार, गर्भवती महिलाएँ और जिन्हें स्वास्थ्य की कोई समस्या है, उन्हें व्रत रखना ज़रूरी नहीं, न छोटे बच्चों और बहुत बुज़ुर्गों को। वे दूध और फल लें और दिन प्रार्थना में बिताएँ। कोई बीमारी हो तो पहले डॉक्टर से पूछें।
अगर ग़लती से व्रत टूट जाए तो?
चिंता न करें। भगवान से क्षमा माँगें, बाक़ी दिन नाम-स्मरण में बिताएँ, और अगली एकादशी ठीक से रखें।
2026 की तारीखें
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2027 की तारीखें
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