व्रत · पौष कृष्ण एकादशी
षटतिला एकादशी 2026
पौष कृष्ण एकादशी (उत्तर भारत में माघ कृष्ण) षटतिला एकादशी है: तिल के छह उपयोगों का दिन। व्रत के साथ दान, यही आज का मंत्र!
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संक्षिप्त जानकारी
- अन्य नामसटतिला एकादशी, माघ कृष्ण एकादशी (उत्तर भारत)
- कहाँपूरा भारत; उत्तर भारत में माघ कृष्ण एकादशी के रूप में
- किसकी पूजाविष्णु (श्रीकृष्ण)
- एक पंक्ति मेंतिल का दान और अन्नदान: व्रत के साथ देना भी ज़रूरी है।
षटतिला एकादशी, थोड़ा विस्तार से
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पर्व के बारे में
षट् यानी छह, और तिल यानी तिल। पुराण कहता है, आज तिल का छह तरह से उपयोग कीजिए: तिल के पानी से स्नान, तिल का लेप, तिल का हवन, तिल खाना, तिल का दान, और दान में तिल लेना।
दान ज़रूरी है, पर सामर्थ्य के अनुसार: तिल, कपड़े, अन्न, जो बन पड़े। दिखावे या लोभ से व्रत मत कीजिए, यह कथा ही कहती है।
कथा की सीख: व्रत अपने लिए, दान दूसरों के लिए। सिर्फ़ उपवास किए और कभी किसी को कुछ नहीं दिया, तो घर ख़ाली ही रहता है।
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मिट्टी के ढेले की कथा
एक बूढ़ी ब्राह्मणी कृष्ण की मन से भक्ति करती थी, बहुत उपवास करती थी। पर उसने कभी ब्राह्मणों या देवताओं को अन्न नहीं दिया।
एक दिन कृष्ण भिक्षापात्र लेकर, शिवभक्त भिक्षुक के वेश में उसके पास भिक्षा माँगने आए। उसने उनके पात्र में मिट्टी का एक ढेला डाल दिया। मृत्यु के बाद उसे उसी मिट्टी का घर मिला: पर भीतर न अनाज, न सामान, कुछ भी नहीं।
उसने कारण पूछा। कृष्ण बोले: देवपत्नियाँ तुमसे मिलने आएँगी; वे षटतिला एकादशी का माहात्म्य न बताएँ, तब तक दरवाज़ा मत खोलना। उसने वैसा ही किया, वह व्रत रखा, और उसका घर अनाज, सामान और रत्नों से भर गया।
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महाराष्ट्र में और दूसरी जगह
महाराष्ट्र में ये तिल के ही दिन हैं: संक्रांति के आसपास तिलगुड़ बाँटा जाता है, और आज फिर तिल का मान। व्रत के पकवानों में भी तिल आते हैं।
कुछ घरों में आज ज़रूरतमंदों को तिल, कपड़े और अन्न दान करते हैं। पुराण में तिल से भरा पात्र दान करने का भी उल्लेख है।
उत्तर भारत में महीना पूर्णिमा को पूरा होता है, इसलिए वहाँ यह माघ कृष्ण एकादशी है। नाम, कथा और तिल के छह उपयोग वही।
पूजा कैसे करें?
संक्षेप में: एक दिन पहले हल्का खाएँ, एकादशी को व्रत और नाम-स्मरण करें, और द्वादशी को सूर्योदय के बाद पारण करें।
- 1एक दिन पहले, दशमी को, हल्का भोजन करें।एक बार सादा भोजन काफ़ी है। रात को भारी कुछ न लें, ताकि एकादशी को पेट हल्का रहे।
- 2पूजा के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें।कई घरों में एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
- 3एकादशी की सुबह स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।मन में तय करें: निर्जला, सिर्फ़ पानी, फल और दूध, या एक बार फलाहार।
- 4विष्णु या विट्ठल की पूजा करें।दीया, अगरबत्ती, चंदन, फूल और तुलसी के पत्ते चढ़ाएँ। फल या दूध का नैवेद्य चढ़ाएँ।
- 5जो व्रत चुना है, उसे दिन भर निभाएँ।चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा और दालें न खाएँ। फलाहार पहले भगवान को चढ़ाएँ, फिर खाएँ।
- 6दिन भगवान के नाम में बिताएँ।हरिपाठ, विष्णु सहस्रनाम, भजन, या इस पेज पर उस एकादशी की कथा।
- 7शाम को फिर दीया जलाकर आरती करें।कई लोग रात भर भजन करते हुए जागरण करते हैं। अगले दिन काम हो तो थोड़ी देर काफ़ी है।
- 8द्वादशी को सूर्योदय के बाद व्रत खोलें।पंचांग में पारण का समय दिया हो तो उसी का पालन करें। पहले भगवान को नैवेद्य, फिर भोजन।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आज तिल के छह उपयोग कौन-से हैं?
तिल मिले पानी से स्नान, शरीर पर तिल का लेप, हवन में तिल, तिल खाना, तिल का दान, और दान में तिल लेना।
व्रत में क्या खा सकते हैं?
यह आपके व्रत पर निर्भर है: कुछ नहीं, सिर्फ़ पानी, फल और दूध, या एक बार फलाहार। फलाहार में साबूदाना, समा के चावल, शकरकंद, आलू और मूँगफली चलते हैं। अनाज और दालें नहीं।
क्या पानी पी सकते हैं?
हाँ, अगर निर्जला व्रत नहीं है। सबसे कठिन व्रत में द्वादशी के सूर्योदय तक पानी भी नहीं होता, पर ज़्यादातर लोग हल्का व्रत रखते हैं।
व्रत कब खोलें?
द्वादशी को सूर्योदय के बाद, इसे पारण कहते हैं। अगर द्वादशी का पहला भाग, हरिवासर, सूर्योदय के बाद भी चल रहा हो, तो उसके ख़त्म होने तक रुकें। पंचांग में यह समय दिया होता है।
कभी-कभी एकादशी की दो तारीख़ें क्यों होती हैं?
जब कोई तिथि घटती या बढ़ती है, तो स्मार्त और भागवत (वारकरी) परंपराओं के नियम अलग हो जाते हैं, इसलिए दोनों की एकादशी अलग-अलग दिन पड़ सकती है। अपने घर की परंपरा का पालन करें।
किन्हें व्रत रखना ज़रूरी नहीं?
बीमार, गर्भवती महिलाएँ और जिन्हें स्वास्थ्य की कोई समस्या है, उन्हें व्रत रखना ज़रूरी नहीं, न छोटे बच्चों और बहुत बुज़ुर्गों को। वे दूध और फल लें और दिन प्रार्थना में बिताएँ। कोई बीमारी हो तो पहले डॉक्टर से पूछें।
अगर ग़लती से व्रत टूट जाए तो?
चिंता न करें। भगवान से क्षमा माँगें, बाक़ी दिन नाम-स्मरण में बिताएँ, और अगली एकादशी ठीक से रखें।
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