व्रत · माघ शुक्ल एकादशी
जया एकादशी 2026
माघ शुक्ल एकादशी जया एकादशी है, और पंढरपुर में माघी यात्रा। इसकी कथा है शाप से मुक्ति देने वाली एकादशी की!
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संक्षिप्त जानकारी
- अन्य नामभैमी एकादशी, माघी एकादशी
- कहाँपूरा भारत; महाराष्ट्र में पंढरपुर की माघी यात्रा
- किसकी पूजाविष्णु (माधव); महाराष्ट्र में विठ्ठल
- एक पंक्ति मेंइंद्र के शाप से पिशाच बने माल्यवान और पुष्पवती इस एकादशी से शापमुक्त हुए।
जया एकादशी, थोड़ा विस्तार से
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पर्व के बारे में
जया यानी विजय। इस एकादशी की विजय है शाप पर: मान्यता है कि की हुई ग़लती का बोझ यहाँ उतरता है।
कथा में उपवास और रात का जागरण दोनों अनजाने में हुए, फिर भी फल मिला। इसलिए आज व्रत के साथ रात के भजन का भी मान है। पारण हमेशा की तरह द्वादशी को।
और एक छोटी सीख: माल्यवान और पुष्पवती एक-दूसरे में इतने खो गए कि हाथ का काम ही भूल गए। प्रेम अच्छी बात है, पर लिए हुए काम का मान भी रखिए।
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माल्यवान और पुष्पवती
स्वर्ग के नंदनवन में इंद्र की संगीत सभा जमी थी। इंद्र के मुख्य गायक चित्रसेन का पुत्र माल्यवान गा रहा था, और अप्सरा पुष्पवती नाच रही थी। दोनों एक-दूसरे पर ऐसे मोहित हुए कि सुर चूक गया और ताल बिगड़ गई।
इंद्र क्रोधित हुए, और उन्होंने दोनों को शाप दिया: पृथ्वी पर पिशाच बनकर रहो। दोनों हिमालय की एक चोटी पर आ गिरे। न स्वाद रहा, न गंध, और हड्डियाँ जमा देने वाली ठंड। गुफा में ठिठुरते हुए वे दिन काटने लगे।
एक बार जया एकादशी को, दुःख में डूबे दोनों ने न पानी पिया, न कुछ खाया। रात को पीपल के नीचे ठंड में एक-दूसरे से लिपटकर वे जागते रहे, और अनजाने में पूरी एकादशी हो गई। द्वादशी की भोर में उनके दिव्य रूप लौट आए। इंद्र के सामने पहुँचते ही इंद्र बोले: तुमने विष्णु का व्रत किया है, अब तुम मेरे लिए भी वंदनीय हो।
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महाराष्ट्र में और दूसरी जगह
पंढरपुर में माघ शुक्ल एकादशी को माघी यात्रा भरती है। आषाढ़ी-कार्तिकी जितनी बड़ी नहीं, फिर भी वारकरी चंद्रभागा में स्नान करके विठ्ठल के दर्शन करते हैं।
घर पर व्रत, विठ्ठल की पूजा, और रात को भजन। कथा में जागरण का ही फल मिला, इसलिए कुछ जगहों पर रात भर हरिनाम चलता है।
कुछ जगहों पर इसे भैमी एकादशी कहते हैं। शुक्ल पक्ष का महीना दोनों पद्धतियों में एक ही होता है, इसलिए उत्तर भारत में भी यह माघ शुक्ल एकादशी ही है।
पूजा कैसे करें?
संक्षेप में: एक दिन पहले हल्का खाएँ, एकादशी को व्रत और नाम-स्मरण करें, और द्वादशी को सूर्योदय के बाद पारण करें।
- 1एक दिन पहले, दशमी को, हल्का भोजन करें।एक बार सादा भोजन काफ़ी है। रात को भारी कुछ न लें, ताकि एकादशी को पेट हल्का रहे।
- 2पूजा के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें।कई घरों में एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
- 3एकादशी की सुबह स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।मन में तय करें: निर्जला, सिर्फ़ पानी, फल और दूध, या एक बार फलाहार।
- 4विष्णु या विट्ठल की पूजा करें।दीया, अगरबत्ती, चंदन, फूल और तुलसी के पत्ते चढ़ाएँ। फल या दूध का नैवेद्य चढ़ाएँ।
- 5जो व्रत चुना है, उसे दिन भर निभाएँ।चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा और दालें न खाएँ। फलाहार पहले भगवान को चढ़ाएँ, फिर खाएँ।
- 6दिन भगवान के नाम में बिताएँ।हरिपाठ, विष्णु सहस्रनाम, भजन, या इस पेज पर उस एकादशी की कथा।
- 7शाम को फिर दीया जलाकर आरती करें।कई लोग रात भर भजन करते हुए जागरण करते हैं। अगले दिन काम हो तो थोड़ी देर काफ़ी है।
- 8द्वादशी को सूर्योदय के बाद व्रत खोलें।पंचांग में पारण का समय दिया हो तो उसी का पालन करें। पहले भगवान को नैवेद्य, फिर भोजन।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
व्रत में क्या खा सकते हैं?
यह आपके व्रत पर निर्भर है: कुछ नहीं, सिर्फ़ पानी, फल और दूध, या एक बार फलाहार। फलाहार में साबूदाना, समा के चावल, शकरकंद, आलू और मूँगफली चलते हैं। अनाज और दालें नहीं।
क्या पानी पी सकते हैं?
हाँ, अगर निर्जला व्रत नहीं है। सबसे कठिन व्रत में द्वादशी के सूर्योदय तक पानी भी नहीं होता, पर ज़्यादातर लोग हल्का व्रत रखते हैं।
व्रत कब खोलें?
द्वादशी को सूर्योदय के बाद, इसे पारण कहते हैं। अगर द्वादशी का पहला भाग, हरिवासर, सूर्योदय के बाद भी चल रहा हो, तो उसके ख़त्म होने तक रुकें। पंचांग में यह समय दिया होता है।
कभी-कभी एकादशी की दो तारीख़ें क्यों होती हैं?
जब कोई तिथि घटती या बढ़ती है, तो स्मार्त और भागवत (वारकरी) परंपराओं के नियम अलग हो जाते हैं, इसलिए दोनों की एकादशी अलग-अलग दिन पड़ सकती है। अपने घर की परंपरा का पालन करें।
किन्हें व्रत रखना ज़रूरी नहीं?
बीमार, गर्भवती महिलाएँ और जिन्हें स्वास्थ्य की कोई समस्या है, उन्हें व्रत रखना ज़रूरी नहीं, न छोटे बच्चों और बहुत बुज़ुर्गों को। वे दूध और फल लें और दिन प्रार्थना में बिताएँ। कोई बीमारी हो तो पहले डॉक्टर से पूछें।
अगर ग़लती से व्रत टूट जाए तो?
चिंता न करें। भगवान से क्षमा माँगें, बाक़ी दिन नाम-स्मरण में बिताएँ, और अगली एकादशी ठीक से रखें।
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