उत्पन्ना एकादशी
कार्तिक कृष्ण एकादशी (उत्तर भारत में मार्गशीर्ष कृष्ण) उत्पन्ना एकादशी है: स्वयं एकादशी देवी का जन्मदिन। मान्यता है कि साल की हर एकादशी की शुरुआत यहीं से होती है!
- 35 दिन बाकी
पूजा कब करें?
पुणे के लिए · सबसे शुभ समय
- पूजा का समय
- प्रदोष काल
- रात
- एकादशी शुरूरात 11:04गुरु, 3 दिस
- एकादशी समाप्तरात 11:45शुक्र, 4 दिस
- प्रदोष कालशाम 5:54 से रात 8:30 तक
दूसरे शहरों का समय
- पुणेशाम 5:54 से रात 8:30 तक
- मुंबईशाम 5:57 से रात 8:33 तक
- ठाणेशाम 5:56 से रात 8:33 तक
- नासिकशाम 5:51 से रात 8:29 तक
- नागपुरशाम 5:28 से रात 8:06 तक
- कोल्हापुरशाम 5:56 से रात 8:31 तक
- दिल्लीशाम 5:21 से रात 8:05 तक
- बेंगलुरुशाम 5:49 से रात 8:21 तक
- इंदौरशाम 5:38 से रात 8:17 तक
- लंदनदोपहर 3:48 से रात 7:01 तक
- न्यू जर्सीशाम 4:25 से रात 7:22 तक
- दुबईशाम 5:25 से रात 8:07 तक
संक्षिप्त जानकारी
- अन्य नामउत्पत्ति एकादशी
- कहाँपूरा भारत; उत्तर भारत में मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी के रूप में
- किसकी पूजाविष्णु और एकादशी देवी
- एक पंक्ति मेंविष्णु की देह से एकादशी देवी प्रकट हुईं और मुर राक्षस का अंत किया।
उत्पन्ना एकादशी, थोड़ा विस्तार से
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पर्व के बारे में
उत्पत्ति यानी जन्म। जिस एकादशी का हम व्रत रखते हैं, वह सिर्फ़ एक तिथि नहीं, एक देवी है। आज उनका जन्मदिन है।
इसीलिए एकादशी का व्रत शुरू करना हो, तो कई लोग इसी एकादशी से शुरुआत करते हैं। व्रत हमेशा जैसा: अन्न नहीं, और पारण द्वादशी को।
कथा की सीख: जब सब थक जाते हैं, तब भीतर से एक शक्ति खड़ी होती है। एकादशी का व्रत उसी भीतरी शक्ति की याद है।
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एकादशी देवी का जन्म
चंद्रावती नगरी में मुर नाम का भयंकर राक्षस रहता था। उसने इंद्र, अग्नि, वायु, सब देवताओं को हराकर स्वर्ग छीन लिया। देवता शिव के पास गए, और शिव ने उन्हें विष्णु के पास भेजा।
विष्णु मुर से लड़े, पर उनके बाण मुर को फूलों जैसे लगते। युद्ध बरसों चला। आख़िर विष्णु बद्रिकाश्रम की एक गुफा में विश्राम के लिए योगनिद्रा में चले गए। मुर पीछा करते हुए वहाँ पहुँचा, और सोए हुए विष्णु पर वार करने बढ़ा।
तभी विष्णु की देह से एक तेजस्वी देवी प्रकट हुईं। वे मुर से लड़ीं और उसका अंत कर दिया। जागने पर विष्णु ने कहा: तुम एकादशी को जन्मीं, इसलिए तुम्हारा नाम एकादशी है। जो तुम्हारा व्रत रखेगा, वह मेरा भक्त है।
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महाराष्ट्र में और दूसरी जगह
कार्तिकी एकादशी के पंद्रह दिन बाद यह एकादशी आती है। वारकरी हमेशा की तरह व्रत, हरिपाठ और विठ्ठल के भजन करते हैं।
एकादशी का व्रत नए सिरे से शुरू करने वाले कई लोग आज का दिन चुनते हैं, और फिर साल भर दोनों पक्षों की एकादशियाँ रखते हैं।
उत्तर भारत में महीना पूर्णिमा को पूरा होता है, इसलिए वहाँ यह मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी है, उत्पन्ना एकादशी नाम से। वहाँ भी व्रत की शुरुआत इसी दिन से मानी जाती है।
पूजा कैसे करें?
संक्षेप में: एक दिन पहले हल्का खाएँ, एकादशी को व्रत और नाम-स्मरण करें, और द्वादशी को सूर्योदय के बाद पारण करें।
- 1एक दिन पहले, दशमी को, हल्का भोजन करें।एक बार सादा भोजन काफ़ी है। रात को भारी कुछ न लें, ताकि एकादशी को पेट हल्का रहे।
- 2पूजा के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें।कई घरों में एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
- 3एकादशी की सुबह स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।मन में तय करें: निर्जला, सिर्फ़ पानी, फल और दूध, या एक बार फलाहार।
- 4विष्णु या विट्ठल की पूजा करें।दीया, अगरबत्ती, चंदन, फूल और तुलसी के पत्ते चढ़ाएँ। फल या दूध का नैवेद्य चढ़ाएँ।
- 5जो व्रत चुना है, उसे दिन भर निभाएँ।चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा और दालें न खाएँ। फलाहार पहले भगवान को चढ़ाएँ, फिर खाएँ।
- 6दिन भगवान के नाम में बिताएँ।हरिपाठ, विष्णु सहस्रनाम, भजन, या इस पेज पर उस एकादशी की कथा।
- 7शाम को फिर दीया जलाकर आरती करें।कई लोग रात भर भजन करते हुए जागरण करते हैं। अगले दिन काम हो तो थोड़ी देर काफ़ी है।
- 8द्वादशी को सूर्योदय के बाद व्रत खोलें।पंचांग में पारण का समय दिया हो तो उसी का पालन करें। पहले भगवान को नैवेद्य, फिर भोजन।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
व्रत में क्या खा सकते हैं?
यह आपके व्रत पर निर्भर है: कुछ नहीं, सिर्फ़ पानी, फल और दूध, या एक बार फलाहार। फलाहार में साबूदाना, समा के चावल, शकरकंद, आलू और मूँगफली चलते हैं। अनाज और दालें नहीं।
क्या पानी पी सकते हैं?
हाँ, अगर निर्जला व्रत नहीं है। सबसे कठिन व्रत में द्वादशी के सूर्योदय तक पानी भी नहीं होता, पर ज़्यादातर लोग हल्का व्रत रखते हैं।
व्रत कब खोलें?
द्वादशी को सूर्योदय के बाद, इसे पारण कहते हैं। अगर द्वादशी का पहला भाग, हरिवासर, सूर्योदय के बाद भी चल रहा हो, तो उसके ख़त्म होने तक रुकें। पंचांग में यह समय दिया होता है।
कभी-कभी एकादशी की दो तारीख़ें क्यों होती हैं?
जब कोई तिथि घटती या बढ़ती है, तो स्मार्त और भागवत (वारकरी) परंपराओं के नियम अलग हो जाते हैं, इसलिए दोनों की एकादशी अलग-अलग दिन पड़ सकती है। अपने घर की परंपरा का पालन करें।
किन्हें व्रत रखना ज़रूरी नहीं?
बीमार, गर्भवती महिलाएँ और जिन्हें स्वास्थ्य की कोई समस्या है, उन्हें व्रत रखना ज़रूरी नहीं, न छोटे बच्चों और बहुत बुज़ुर्गों को। वे दूध और फल लें और दिन प्रार्थना में बिताएँ। कोई बीमारी हो तो पहले डॉक्टर से पूछें।
अगर ग़लती से व्रत टूट जाए तो?
चिंता न करें। भगवान से क्षमा माँगें, बाक़ी दिन नाम-स्मरण में बिताएँ, और अगली एकादशी ठीक से रखें।
ऐप में याद लगाएँ
ऐप एक दिन पहले और उसी दिन सूचना भेजता है, बिना इंटरनेट भी।