ऐप पाएँ
कालदर्शीआज

पापांकुशा एकादशी

आश्विन शुक्ल एकादशी पापांकुशा एकादशी है: दशहरे के बाद की एकादशी। पाप पर अंकुश रखने वाला व्रत!

11अक्तूसोमवार, 11 अक्तूबर 2027एकादशी दोपहर 2:09 तक
  • 346 दिन बाकी

पूजा कब करें?

पुणे के लिए · सबसे शुभ समय

  • पूजा का समय
  • प्रदोष काल
  • रात
  • एकादशी शुरूसुबह 11:41रवि, 10 अक्तू
  • एकादशी समाप्तदोपहर 2:09सोम, 11 अक्तू
  • प्रदोष कालशाम 6:12 से रात 8:40 तक
दूसरे शहरों का समय
  • पुणेशाम 6:12 से रात 8:40 तक
  • मुंबईशाम 6:16 से रात 8:44 तक
  • ठाणेशाम 6:16 से रात 8:43 तक
  • नासिकशाम 6:12 से रात 8:40 तक
  • नागपुरशाम 5:50 से रात 8:18 तक
  • कोल्हापुरशाम 6:12 से रात 8:39 तक
  • दिल्लीशाम 5:53 से रात 8:23 तक
  • बेंगलुरुशाम 6:00 से रात 8:27 तक
  • इंदौरशाम 6:02 से रात 8:30 तक
  • लंदनशाम 6:12 से रात 8:50 तक
  • न्यू जर्सीशाम 6:21 से रात 8:54 तक
  • दुबईशाम 5:53 से रात 8:22 तक

संक्षिप्त जानकारी

  • अन्य नामपाशांकुशा एकादशी
  • कहाँपूरा भारत
  • किसकी पूजापद्मनाभ (विष्णु)
  • एक पंक्ति मेंजैसे हाथी पर अंकुश, वैसे पाप पर यह व्रत: जीवन भर हिंसा करने वाले शिकारी को भी इसी से मुक्ति मिली।

पापांकुशा एकादशी, थोड़ा विस्तार से

  1. 01

    पर्व के बारे में

    पाश यानी फंदा, और अंकुश यानी हाथी को मोड़ने वाला अंकुश। मान्यता है कि हाथी जैसे बड़े पाप को भी यह व्रत मोड़ देता है।

    आज कमलनाभ विष्णु, यानी पद्मनाभ की पूजा होती है। व्रत हमेशा जैसा, रात को जागरण और नामस्मरण, और पारण द्वादशी को।

    इस एकादशी में दान का भी मान है: अन्न, तिल, पानी, छाता और जूते, अपनी सामर्थ्य के अनुसार। आज की सीख: देर कभी नहीं होती। मुड़ने का तय कर लें, तो राह मिल जाती है।

  2. 02

    क्रोधन शिकारी की कथा

    विंध्य पर्वत में क्रोधन नाम का एक क्रूर शिकारी रहता था। जीवन भर उसने हिंसा की और पशुओं को मारा।

    बुढ़ापे में उसे मृत्यु और यमराज के दंड का डर सताने लगा। वह अंगिरा ऋषि के आश्रम गया और पूछा: क्या नरक से बचने का कोई उपाय है?

    अंगिरा ऋषि ने उसे आश्विन शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी का व्रत करने को कहा। क्रोधन ने सच्चे मन से व्रत, जागरण और विष्णु पूजा की। जैसे अंकुश हाथी को रोकता है, वैसे उसके पाप नष्ट हो गए, और जीवन के अंत में वह वैकुंठ गया।

  3. 03

    महाराष्ट्र में और दूसरी जगह

    नवरात्र और दशहरा अभी-अभी बीते होते हैं, और चार दिन बाद कोजागिरी पूर्णिमा। त्योहारों के इन दिनों में यह एकादशी व्रत का एक शांत दिन है।

    घर पर व्रत, विठ्ठल की पूजा, और रात को हरिनाम। कुछ लोग आज अन्न या कपड़े दान करते हैं।

    महाराष्ट्र और उत्तर भारत में महीना एक ही है: शुक्ल पक्ष का नाम दोनों पद्धतियों में एक जैसा होता है, इसलिए हर जगह यह आश्विन शुक्ल एकादशी है।

पूजा कैसे करें?

संक्षेप में: एक दिन पहले हल्का खाएँ, एकादशी को व्रत और नाम-स्मरण करें, और द्वादशी को सूर्योदय के बाद पारण करें।

  1. 1एक दिन पहले, दशमी को, हल्का भोजन करें।एक बार सादा भोजन काफ़ी है। रात को भारी कुछ न लें, ताकि एकादशी को पेट हल्का रहे।
  2. 2पूजा के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें।कई घरों में एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
  3. 3एकादशी की सुबह स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।मन में तय करें: निर्जला, सिर्फ़ पानी, फल और दूध, या एक बार फलाहार।
  4. 4विष्णु या विट्ठल की पूजा करें।दीया, अगरबत्ती, चंदन, फूल और तुलसी के पत्ते चढ़ाएँ। फल या दूध का नैवेद्य चढ़ाएँ।
  5. 5जो व्रत चुना है, उसे दिन भर निभाएँ।चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा और दालें न खाएँ। फलाहार पहले भगवान को चढ़ाएँ, फिर खाएँ।
  6. 6दिन भगवान के नाम में बिताएँ।हरिपाठ, विष्णु सहस्रनाम, भजन, या इस पेज पर उस एकादशी की कथा।
  7. 7शाम को फिर दीया जलाकर आरती करें।कई लोग रात भर भजन करते हुए जागरण करते हैं। अगले दिन काम हो तो थोड़ी देर काफ़ी है।
  8. 8द्वादशी को सूर्योदय के बाद व्रत खोलें।पंचांग में पारण का समय दिया हो तो उसी का पालन करें। पहले भगवान को नैवेद्य, फिर भोजन।

क्या चाहिए?टिक करते जाएँ

9 में से 0 तैयार

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

व्रत में क्या खा सकते हैं?

यह आपके व्रत पर निर्भर है: कुछ नहीं, सिर्फ़ पानी, फल और दूध, या एक बार फलाहार। फलाहार में साबूदाना, समा के चावल, शकरकंद, आलू और मूँगफली चलते हैं। अनाज और दालें नहीं।

क्या पानी पी सकते हैं?

हाँ, अगर निर्जला व्रत नहीं है। सबसे कठिन व्रत में द्वादशी के सूर्योदय तक पानी भी नहीं होता, पर ज़्यादातर लोग हल्का व्रत रखते हैं।

व्रत कब खोलें?

द्वादशी को सूर्योदय के बाद, इसे पारण कहते हैं। अगर द्वादशी का पहला भाग, हरिवासर, सूर्योदय के बाद भी चल रहा हो, तो उसके ख़त्म होने तक रुकें। पंचांग में यह समय दिया होता है।

कभी-कभी एकादशी की दो तारीख़ें क्यों होती हैं?

जब कोई तिथि घटती या बढ़ती है, तो स्मार्त और भागवत (वारकरी) परंपराओं के नियम अलग हो जाते हैं, इसलिए दोनों की एकादशी अलग-अलग दिन पड़ सकती है। अपने घर की परंपरा का पालन करें।

किन्हें व्रत रखना ज़रूरी नहीं?

बीमार, गर्भवती महिलाएँ और जिन्हें स्वास्थ्य की कोई समस्या है, उन्हें व्रत रखना ज़रूरी नहीं, न छोटे बच्चों और बहुत बुज़ुर्गों को। वे दूध और फल लें और दिन प्रार्थना में बिताएँ। कोई बीमारी हो तो पहले डॉक्टर से पूछें।

अगर ग़लती से व्रत टूट जाए तो?

चिंता न करें। भगवान से क्षमा माँगें, बाक़ी दिन नाम-स्मरण में बिताएँ, और अगली एकादशी ठीक से रखें।

ऐप में याद लगाएँ

ऐप एक दिन पहले और उसी दिन सूचना भेजता है, बिना इंटरनेट भी।

ऐप पाएँ

कालदर्शी को बेहतर बनाने में मदद करेंगे?

हम कालदर्शी का उपयोग गिनने के लिए Google Analytics इस्तेमाल करना चाहते हैं। इसमें कुकीज़ लगती हैं। आपका नाम या स्थान नहीं लिया जाता। गोपनीयता