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कालदर्शीआज

मोहिनी एकादशी

वैशाख शुक्ल एकादशी मोहिनी एकादशी है। मान्यता है कि इसी दिन विष्णु ने मोहिनी रूप लेकर देवताओं को अमृत बाँटा!

16मईरविवार, 16 मई 2027एकादशी शाम 5:13 तक
  • 198 दिन बाकी

पूजा कब करें?

पुणे के लिए · सबसे शुभ समय

  • पूजा का समय
  • प्रदोष काल
  • रात
  • एकादशी शुरूशाम 6:17शनि, 15 मई
  • एकादशी समाप्तशाम 5:13रवि, 16 मई
  • प्रदोष कालशाम 6:58 से रात 9:11 तक
दूसरे शहरों का समय
  • पुणेशाम 6:58 से रात 9:11 तक
  • मुंबईरात 7:03 से रात 9:16 तक
  • ठाणेरात 7:03 से रात 9:15 तक
  • नासिकरात 7:01 से रात 9:13 तक
  • नागपुरशाम 6:42 से रात 8:53 तक
  • कोल्हापुरशाम 6:54 से रात 9:08 तक
  • दिल्लीरात 7:02 से रात 9:08 तक
  • बेंगलुरुशाम 6:35 से रात 8:51 तक
  • इंदौरशाम 6:57 से रात 9:07 तक
  • लंदनरात 8:42 से रात 10:24 तक
  • न्यू जर्सीरात 8:04 से रात 9:59 तक
  • दुबईशाम 6:54 से रात 9:02 तक

संक्षिप्त जानकारी

  • अन्य नामवैशाख शुक्ल एकादशी
  • कहाँपूरा भारत; तमिल कैलेंडर में वैकासी, मलयालम में एडवम महीने में
  • किसकी पूजाविष्णु, मोहिनी रूप में
  • एक पंक्ति मेंविष्णु के मोहिनी रूप की याद, और मोह से छुड़ाने वाला व्रत।

मोहिनी एकादशी, थोड़ा विस्तार से

  1. 01

    पर्व के बारे में

    समुद्र मंथन से अमृत निकला, और असुर उसे अपने पास ही रखना चाहते थे। तब विष्णु ने मोहिनी नाम का सुंदर स्त्री रूप लिया, असुरों को लुभाकर अमृत का कलश ले लिया, और उसे देवताओं में बाँट दिया।

    नाम मोहिनी का, और व्रत का अर्थ उल्टा: मोह से छुटकारा। कथा के अनुसार यह एकादशी संसार के मोह के बंधन ढीले करती है।

    आज की सीख: जो चीज़ें हमें लुभाती हैं, वही हमें फँसाती हैं। एक दिन उनसे दूर रहकर देखिए।

  2. 02

    धृष्टबुद्धि की कथा

    सीता के वियोग में दुखी राम को वसिष्ठ ऋषि ने यह कथा सुनाई। सरस्वती के किनारे भद्रावती नगरी में धनपाल नाम का धनी और धर्मात्मा व्यापारी रहता था। उसने लोगों के लिए तालाब खुदवाए, बाग़ लगवाए। उसके पाँच बेटे थे, और सबसे छोटा धृष्टबुद्धि पूरी तरह बिगड़ा हुआ था।

    जुआ, शराब, पिता के पैसों की बर्बादी। आख़िर धनपाल ने उसे घर से निकाल दिया। पैसे ख़त्म हुए, दोस्त छोड़ गए, और वह चोरी करने लगा। पकड़ा गया, कोड़े खाए, और आख़िर में जंगल भाग गया।

    वैशाख के महीने में भटकते हुए वह कौंडिन्य ऋषि के आश्रम पहुँचा। ऋषि अभी गंगा में स्नान करके आए थे, और उनके वस्त्रों की कुछ बूँदें उस पर गिरीं। धृष्टबुद्धि ने हाथ जोड़कर रास्ता पूछा। ऋषि बोले: वैशाख शुक्ल एकादशी को, मोहिनी एकादशी को, पूरा उपवास करो। उसने वैसा ही किया, और उसके सारे पाप धुल गए।

  3. 03

    महाराष्ट्र में और दूसरी जगह

    घर पर व्रत, विठ्ठल की पूजा, तुलसी के पत्ते और फलों का भोग। शाम को विष्णु सहस्रनाम या भजन।

    आज अन्नदान का मान है: अनाज, भोजन, या ज़रूरतमंदों को कपड़े।

    दक्षिण में यह एकादशी तमिल वैकासी और मलयालम एडवम महीने में आती है। महीने का नाम अलग है, पर व्रत और कथा वही हैं।

पूजा कैसे करें?

संक्षेप में: एक दिन पहले हल्का खाएँ, एकादशी को व्रत और नाम-स्मरण करें, और द्वादशी को सूर्योदय के बाद पारण करें।

  1. 1एक दिन पहले, दशमी को, हल्का भोजन करें।एक बार सादा भोजन काफ़ी है। रात को भारी कुछ न लें, ताकि एकादशी को पेट हल्का रहे।
  2. 2पूजा के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें।कई घरों में एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
  3. 3एकादशी की सुबह स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।मन में तय करें: निर्जला, सिर्फ़ पानी, फल और दूध, या एक बार फलाहार।
  4. 4विष्णु या विट्ठल की पूजा करें।दीया, अगरबत्ती, चंदन, फूल और तुलसी के पत्ते चढ़ाएँ। फल या दूध का नैवेद्य चढ़ाएँ।
  5. 5जो व्रत चुना है, उसे दिन भर निभाएँ।चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा और दालें न खाएँ। फलाहार पहले भगवान को चढ़ाएँ, फिर खाएँ।
  6. 6दिन भगवान के नाम में बिताएँ।हरिपाठ, विष्णु सहस्रनाम, भजन, या इस पेज पर उस एकादशी की कथा।
  7. 7शाम को फिर दीया जलाकर आरती करें।कई लोग रात भर भजन करते हुए जागरण करते हैं। अगले दिन काम हो तो थोड़ी देर काफ़ी है।
  8. 8द्वादशी को सूर्योदय के बाद व्रत खोलें।पंचांग में पारण का समय दिया हो तो उसी का पालन करें। पहले भगवान को नैवेद्य, फिर भोजन।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

व्रत में क्या खा सकते हैं?

यह आपके व्रत पर निर्भर है: कुछ नहीं, सिर्फ़ पानी, फल और दूध, या एक बार फलाहार। फलाहार में साबूदाना, समा के चावल, शकरकंद, आलू और मूँगफली चलते हैं। अनाज और दालें नहीं।

क्या पानी पी सकते हैं?

हाँ, अगर निर्जला व्रत नहीं है। सबसे कठिन व्रत में द्वादशी के सूर्योदय तक पानी भी नहीं होता, पर ज़्यादातर लोग हल्का व्रत रखते हैं।

व्रत कब खोलें?

द्वादशी को सूर्योदय के बाद, इसे पारण कहते हैं। अगर द्वादशी का पहला भाग, हरिवासर, सूर्योदय के बाद भी चल रहा हो, तो उसके ख़त्म होने तक रुकें। पंचांग में यह समय दिया होता है।

कभी-कभी एकादशी की दो तारीख़ें क्यों होती हैं?

जब कोई तिथि घटती या बढ़ती है, तो स्मार्त और भागवत (वारकरी) परंपराओं के नियम अलग हो जाते हैं, इसलिए दोनों की एकादशी अलग-अलग दिन पड़ सकती है। अपने घर की परंपरा का पालन करें।

किन्हें व्रत रखना ज़रूरी नहीं?

बीमार, गर्भवती महिलाएँ और जिन्हें स्वास्थ्य की कोई समस्या है, उन्हें व्रत रखना ज़रूरी नहीं, न छोटे बच्चों और बहुत बुज़ुर्गों को। वे दूध और फल लें और दिन प्रार्थना में बिताएँ। कोई बीमारी हो तो पहले डॉक्टर से पूछें।

अगर ग़लती से व्रत टूट जाए तो?

चिंता न करें। भगवान से क्षमा माँगें, बाक़ी दिन नाम-स्मरण में बिताएँ, और अगली एकादशी ठीक से रखें।

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