गुड़ी पड़वा
मराठी नववर्ष का पहला दिन। दरवाज़े पर गुढी खड़ी कीजिए, नीम और गुड़ चखिए, और नए साल का स्वागत कीजिए!
- 159 दिन बाकी
पूजा कब करें?
पुणे के लिए · सबसे शुभ समय
सुबह 6:26
- पूजा का समय
- प्रदोष काल
- रात
- प्रतिपदा शुरूभोर 5:21बुध, 7 अप्रैल
- प्रतिपदा समाप्तभोर 4:29गुरु, 8 अप्रैल
- प्रदोष कालशाम 6:47 से रात 9:06 तक
दूसरे शहरों का समय
- पुणेसुबह 6:26
- मुंबईसुबह 6:30
- ठाणेसुबह 6:29
- नासिकसुबह 6:26
- नागपुरसुबह 6:04
- कोल्हापुरसुबह 6:26
- दिल्लीसुबह 6:07
- बेंगलुरुसुबह 6:14
- इंदौरसुबह 6:16
- लंदनसुबह 6:26
- न्यू जर्सीसुबह 6:33
- दुबईसुबह 6:07
संक्षिप्त जानकारी
- अन्य नामपाड़वा, उगादि (कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना), चेटी चंड (सिंधी), नवरेह (कश्मीर)
- कहाँमहाराष्ट्र, गोवा और दमन; दूसरे प्रदेशों में अलग नाम से
- किसकी पूजागुढी, ब्रह्मध्वज के रूप में
- एक पंक्ति मेंचैत्र शुक्ल प्रतिपदा: मराठी और कोंकणी नववर्ष, और शालिवाहन शक का नया वर्ष।
गुड़ी पड़वा, थोड़ा विस्तार से
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पर्व के बारे में
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मराठी वर्ष शुरू होता है, और शालिवाहन शक का नया वर्ष भी आज ही। वसंत पूरे शबाब पर होता है, इसलिए नई शुरुआत के लिए इससे अच्छा दिन नहीं।
गुढी विजय और आनंद का निशान है। मान्यता है कि ब्रह्मा ने इसी दिन सृष्टि रची, इसलिए गुढी को ब्रह्मध्वज भी कहते हैं।
आज नीम की पत्तियाँ गुड़ के साथ खाते हैं। कड़वा और मीठा एक साथ: साल में दोनों आएँगे, दोनों को अपनाइए, यही इसका अर्थ है।
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गुढी क्यों?
गुढी के पीछे एक ही कथा नहीं है। एक कथा के अनुसार रावण पर विजय के बाद राम अयोध्या लौटे और उनका राज्याभिषेक हुआ, और खुशी में लोगों ने घर-घर गुढियाँ खड़ी कीं।
दूसरी कथा महाराष्ट्र की है। राजा शालिवाहन ने शत्रुओं पर विजय पाई, और पैठण लौटने पर लोगों ने गुढियाँ खड़ी करके उनका स्वागत किया। उसी विजय से शालिवाहन शक गिना जाता है।
और सबसे पुरानी मान्यता: ब्रह्मा ने इसी दिन काल और सृष्टि की रचना की। इसलिए नया वर्ष आज से।
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महाराष्ट्र में और दूसरी जगह
सुबह दरवाज़े या खिड़की पर गुढी खड़ी करते हैं: ऊँचे बाँस के सिरे पर रेशमी वस्त्र, नीम और आम की पत्तियाँ, फूलों की माला और शक्कर की गाठी, और ऊपर ताँबे या चाँदी का लोटा। सूर्यास्त पर गुढी उतारते हैं।
दरवाज़े पर रंगोली, और भोजन में श्रीखंड-पूरी या पूरणपोळी। यह साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक है, इसलिए नई ख़रीदारी, गृहप्रवेश या नया काम शुरू करने के लिए शुभ।
गिरगाँव, डोंबिवली, ठाणे और पुणे में नववर्ष की शोभायात्राएँ निकलती हैं: नौवारी साड़ी, फेटे, ढोल-ताशा और लेज़िम।
कर्नाटक, आंध्र और तेलंगाना में यही दिन उगादि है: वहाँ भी नीम, गुड़ और इमली की पचड़ी खाते हैं। सिंधी चेटी चंड और कश्मीरी पंडित नवरेह मनाते हैं।
पूजा कैसे करें?
संक्षेप में: साफ़ घर, द्वार पर रंगोली, सूर्योदय के बाद गुढी, नीम-गुड़, मीठा भोग, और सूर्यास्त पर गुढी उतारें।
- 1घर साफ़ करें, और द्वार पर रंगोली बनाएँ।कई घरों में रंगोली के बीच स्वस्तिक बनाकर उस पर हल्दी-कुमकुम चढ़ाते हैं।
- 2स्नान करके नए या पारंपरिक कपड़े पहनें।महिलाएँ नौवारी साड़ी और पुरुष फेटा, कई घरों में यह शौक भी है।
- 3गुढी तैयार करें: डंडे के सिरे पर रेशमी कपड़ा, नीम और आम के पत्ते, फूलों की माला, शक्कर की माला (गाठी), और ऊपर उल्टा लोटा।कपड़े की जगह साड़ी भी चलती है। लोटा तांबे, चाँदी या पीतल का।
- 4सूर्योदय के बाद द्वार के पास या खिड़की पर गुढी खड़ी करें।घर से बाहर देखते हुए द्वार की दाईं ओर गुढी खड़ी करते हैं। उसे कसकर बाँधें, ताकि हवा से न गिरे।
- 5चंदन, फूल, अक्षत और हल्दी-कुमकुम चढ़ाकर, दीया और अगरबत्ती जलाकर गुढी की पूजा करें।गुढी के पास गणेश और कुलदेवता का भी स्मरण करें, और बड़ों को प्रणाम करें।
- 6नीम की पत्तियाँ गुड़ के साथ, या नीम की चटनी, खाएँ।चटनी में नीम की पत्तियों के साथ अजवाइन, नमक, हींग, काली मिर्च और शक्कर या गुड़ पीसते हैं।
- 7पूरणपोळी या श्रीखंड-पूरी का भोग लगाएँ, और नए वर्ष का पंचांग सुनें।पंचांग सुनना यानी वर्षफल सुनना: नए वर्ष में क्या आने वाला है, यह सुनना।
- 8सूर्यास्त पर हल्दी-कुमकुम और फूल चढ़ाकर गुढी उतारें।गुढी देर रात तक नहीं रखते: दिन ढला कि नया वर्ष घर में आ गया।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
फ़्लैट में गुढी कहाँ खड़ी करें?
बालकनी में या द्वार के पास की खिड़की पर, जहाँ बाहर से दिखे। उसे ग्रिल से कसकर बाँधें, और ध्यान रखें कि नीचे किसी पर न गिरे।
गुढी कब उतारें?
सूर्यास्त पर। फिर से हल्दी-कुमकुम और फूल चढ़ाकर गुढी उतारते हैं।
उतारने के बाद गुढी की चीज़ों का क्या करें?
शक्कर की माला प्रसाद के रूप में बाँटें। कपड़ा और लोटा फिर से काम में लें। पत्ते और फूल किसी पेड़ की जड़ में या खाद में डालें।
पंचांग सुनने के लिए पंडित ज़रूरी हैं?
परंपरा से वर्षफल पुरोहित से सुनते हैं। कई घरों में बड़े नए पंचांग से पढ़कर सुनाते हैं, और मंदिरों में भी पंचांग वाचन होता है।
गुढी तिरछी क्यों रखते हैं?
कई घरों में गुढी थोड़ी तिरछी, बाहर की ओर झुकाकर खड़ी करते हैं; कुछ घरों में सीधी। जैसी घर की रीत हो, वैसा करें।
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