देवशयनी एकादशी
आषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी आषाढ़ी: आज विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं और चातुर्मास शुरू होता है। और आज वारी पंढरपुर पहुँचती है, विठ्ठल के दर्शन को लाखों वारकरी!
- 257 दिन बाकी
पूजा कब करें?
पुणे के लिए · सबसे शुभ समय
- पूजा का समय
- प्रदोष काल
- रात
- एकादशी शुरूदोपहर 12:09मंगल, 13 जुलाई
- एकादशी समाप्तदोपहर 1:10बुध, 14 जुलाई
- प्रदोष कालरात 7:12 से रात 9:23 तक
दूसरे शहरों का समय
- पुणेरात 7:12 से रात 9:23 तक
- मुंबईरात 7:17 से रात 9:28 तक
- ठाणेरात 7:17 से रात 9:27 तक
- नासिकरात 7:15 से रात 9:25 तक
- नागपुरशाम 6:56 से रात 9:05 तक
- कोल्हापुररात 7:07 से रात 9:20 तक
- दिल्लीरात 7:18 से रात 9:21 तक
- बेंगलुरुशाम 6:47 से रात 9:02 तक
- इंदौररात 7:11 से रात 9:20 तक
- लंदनरात 9:08 से रात 10:43 तक
- न्यू जर्सीरात 8:24 से रात 10:15 तक
- दुबईरात 7:09 से रात 9:15 तक
संक्षिप्त जानकारी
- अन्य नामआषाढ़ी एकादशी, हरिशयनी एकादशी, महा एकादशी
- कहाँपंढरपुर और पूरा महाराष्ट्र; उत्तर भारत में देवशयनी या हरिशयनी एकादशी
- किसकी पूजाविष्णु; महाराष्ट्र में विठ्ठल
- एक पंक्ति मेंविष्णु सो जाते हैं और चातुर्मास शुरू होता है; वारकरियों की वारी विठ्ठल तक पहुँचती है।
देवशयनी एकादशी, थोड़ा विस्तार से
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पर्व के बारे में
आषाढ़ शुक्ल एकादशी देवशयनी है: क्षीरसागर में शेषनाग पर विष्णु सो जाते हैं, और सीधे कार्तिकी एकादशी को जागते हैं। बीच के चार महीने चातुर्मास कहलाते हैं, और वे बरसात के साथ ही आते हैं।
इसलिए आज कई लोग चातुर्मास का नियम लेते हैं: कोई एक चीज़ छोड़ना, या हर एकादशी रखना। और वारकरी संप्रदाय में आज के व्रत का महत्त्व सबसे ज़्यादा है।
आषाढ़ी की सीख वारी में ही है: भगवान के पास अकेले नहीं, सबके साथ चलकर जाना। राह लंबी होती है, पर साथ हो तो कट जाती है।
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राजा मांधाता और अकाल
मांधाता नाम के एक धर्मनिष्ठ राजा थे। पर एक बार उनके राज्य में लगातार तीन साल बारिश ही नहीं हुई।
खेत सूख गए, और प्रजा बेहाल हो गई। उपाय खोजते हुए राजा अंगिरस ऋषि के पास गए।
ऋषि ने कहा: देवशयनी एकादशी का व्रत कीजिए। राजा ने व्रत किया, और विष्णु की कृपा से राज्य में झमाझम बारिश हुई। आषाढ़ी और बारिश का रिश्ता इतना पुराना है।
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महाराष्ट्र में और दूसरी जगह
आळंदी से ज्ञानेश्वर की और देहू से तुकाराम की पालकी निकलती है, और राह में कई पालकियाँ उनसे आ मिलती हैं। लगभग ढाई सौ किलोमीटर, तीन हफ़्ते: दिंडियों में चलते हुए, "ज्ञानबा तुकाराम" गाते हुए वारकरी आषाढ़ी को पंढरपुर पहुँचते हैं।
पंढरपुर में पहले चंद्रभागा में स्नान, फिर विठ्ठल के दर्शन। भोर से पहले मुख्यमंत्री सपत्नीक विठ्ठल-रुक्मिणी की शासकीय महापूजा करते हैं, और उनके साथ एक वारकरी दंपती को पूजा का सम्मान मिलता है।
जो वारी में नहीं जा पाते, वे घर पर ही व्रत रखते हैं: साबूदाना, राजगिरा, शकरकंद और मूँगफली। स्कूलों और गाँव-गाँव के विठ्ठल मंदिरों से बच्चों की दिंडियाँ निकलती हैं।
उत्तर भारत में यह देवशयनी या हरिशयनी एकादशी है: विष्णु और लक्ष्मी की पूजा, व्रत, और रात भर भजन।
पूजा कैसे करें?
संक्षेप में: एक दिन पहले हल्का खाएँ, एकादशी को व्रत और नाम-स्मरण करें, और द्वादशी को सूर्योदय के बाद पारण करें।
- 1एक दिन पहले, दशमी को, हल्का भोजन करें।एक बार सादा भोजन काफ़ी है। रात को भारी कुछ न लें, ताकि एकादशी को पेट हल्का रहे।
- 2पूजा के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें।कई घरों में एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
- 3एकादशी की सुबह स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।मन में तय करें: निर्जला, सिर्फ़ पानी, फल और दूध, या एक बार फलाहार।
- 4विष्णु या विट्ठल की पूजा करें।दीया, अगरबत्ती, चंदन, फूल और तुलसी के पत्ते चढ़ाएँ। फल या दूध का नैवेद्य चढ़ाएँ।
- 5जो व्रत चुना है, उसे दिन भर निभाएँ।चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा और दालें न खाएँ। फलाहार पहले भगवान को चढ़ाएँ, फिर खाएँ।
- 6दिन भगवान के नाम में बिताएँ।हरिपाठ, विष्णु सहस्रनाम, भजन, या इस पेज पर उस एकादशी की कथा।
- 7शाम को फिर दीया जलाकर आरती करें।कई लोग रात भर भजन करते हुए जागरण करते हैं। अगले दिन काम हो तो थोड़ी देर काफ़ी है।
- 8द्वादशी को सूर्योदय के बाद व्रत खोलें।पंचांग में पारण का समय दिया हो तो उसी का पालन करें। पहले भगवान को नैवेद्य, फिर भोजन।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
चातुर्मास क्या है?
आज से कार्तिकी एकादशी तक के चार महीने। इस समय कई लोग कोई एक चीज़ खाना छोड़ देते हैं, या हर एकादशी पर व्रत का संकल्प लेते हैं।
व्रत में क्या खा सकते हैं?
यह आपके व्रत पर निर्भर है: कुछ नहीं, सिर्फ़ पानी, फल और दूध, या एक बार फलाहार। फलाहार में साबूदाना, समा के चावल, शकरकंद, आलू और मूँगफली चलते हैं। अनाज और दालें नहीं।
क्या पानी पी सकते हैं?
हाँ, अगर निर्जला व्रत नहीं है। सबसे कठिन व्रत में द्वादशी के सूर्योदय तक पानी भी नहीं होता, पर ज़्यादातर लोग हल्का व्रत रखते हैं।
व्रत कब खोलें?
द्वादशी को सूर्योदय के बाद, इसे पारण कहते हैं। अगर द्वादशी का पहला भाग, हरिवासर, सूर्योदय के बाद भी चल रहा हो, तो उसके ख़त्म होने तक रुकें। पंचांग में यह समय दिया होता है।
कभी-कभी एकादशी की दो तारीख़ें क्यों होती हैं?
जब कोई तिथि घटती या बढ़ती है, तो स्मार्त और भागवत (वारकरी) परंपराओं के नियम अलग हो जाते हैं, इसलिए दोनों की एकादशी अलग-अलग दिन पड़ सकती है। अपने घर की परंपरा का पालन करें।
किन्हें व्रत रखना ज़रूरी नहीं?
बीमार, गर्भवती महिलाएँ और जिन्हें स्वास्थ्य की कोई समस्या है, उन्हें व्रत रखना ज़रूरी नहीं, न छोटे बच्चों और बहुत बुज़ुर्गों को। वे दूध और फल लें और दिन प्रार्थना में बिताएँ। कोई बीमारी हो तो पहले डॉक्टर से पूछें।
अगर ग़लती से व्रत टूट जाए तो?
चिंता न करें। भगवान से क्षमा माँगें, बाक़ी दिन नाम-स्मरण में बिताएँ, और अगली एकादशी ठीक से रखें।
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