त्योहार · कार्तिक पूर्णिमा
कार्तिक पूर्णिमा 2026
दिवाली के पंद्रह दिन बाद आने वाली देवताओं की दिवाली। आज शाम घर और मंदिर में एक बार फिर दीये जलते हैं।
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संक्षिप्त जानकारी
- अन्य नामकार्तिक पूर्णिमा, त्रिपुरी पूर्णिमा, देव दीपावली
- कहाँमहाराष्ट्र और पूरा भारत; वाराणसी में देव दीपावली
- किसकी पूजाशिव (त्रिपुरारी)
- एक पंक्ति मेंवह दिन जब शिव ने त्रिपुरासुर का नाश किया, और खुशी में देवताओं ने दीप जलाए।
कार्तिक पूर्णिमा, थोड़ा विस्तार से
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पर्व के बारे में
कार्तिक महीने की पूर्णिमा ही त्रिपुरारी पूर्णिमा है। त्रिपुरारी शिव का नाम है: त्रिपुरों का शत्रु।
दिवाली पर हम घर रोशन करते हैं। आज देवताओं की बारी है: असुर पर जीत के बाद उन्होंने दीप जलाए, और आज हम फिर दीये जलाकर उस खुशी में शामिल होते हैं।
इसका अर्थ सीधा है। मुसीबत कितनी भी बड़ी दिखे, सही समय पर एक बाण ही काफ़ी है। धीरज रखें, और वह समय पहचानें।
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त्रिपुरासुर की कथा
तारकासुर के तीन पुत्रों ने कठोर तप करके ब्रह्मा से वर पाया। मय दानव ने उनके लिए तीन नगर बनाए: स्वर्ग में सोने का, पृथ्वी पर चाँदी का और पाताल में लोहे का। वर यह था कि ये तीनों नगर जब एक सीध में आएँगे, तभी और एक ही बाण से नष्ट हो सकेंगे।
वर के बल पर तीनों भाई देवताओं और ऋषियों को सताने लगे। देवता शिव के पास गए। शिव ने पृथ्वी को रथ, मेरु पर्वत को धनुष और विष्णु को बाण बनाया।
हज़ारों वर्षों बाद तीनों नगर एक सीध में आए, और उसी क्षण शिव ने एक बाण छोड़ा। तीनों नगर जलकर नष्ट हो गए। वह दिन कार्तिक पूर्णिमा का था, इसलिए शिव त्रिपुरारी कहलाए और यह पूर्णिमा त्रिपुरारी पूर्णिमा।
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महाराष्ट्र में और दूसरी जगह
शाम को मंदिरों के सामने की दीपमालाएँ जलाई जाती हैं, ख़ासकर शिव मंदिरों में। घर में दरवाज़े, आँगन और तुलसी के पास दीये जलते हैं।
कुछ जगहों पर देवता के सामने त्रिपुर, यानी लंबी बाती, जलाते हैं। आश्विन पूर्णिमा से महीना भर चला कार्तिक स्नान और विट्ठल मंदिरों की काकड़ आरती आज पूरी होती है।
वाराणसी में आज गंगा के घाटों पर लाखों दीये जलते हैं: यही देव दीपावली है। सिख इसी पूर्णिमा को गुरु नानक जयंती, यानी गुरुपर्व, मनाते हैं।
पूजा कैसे करें?
संक्षेप में: सुबह स्नान, और शाम को दीये: दरवाज़े पर, तुलसी के पास, शिव के आगे त्रिपुर, और मंदिर की दीपमाला।
- 1सुबह जल्दी स्नान करें।आश्विन पूर्णिमा से कार्तिक स्नान करने वालों का वह आज पूरा होता है।
- 2घर साफ़ करें और दरवाज़े पर रंगोली बनाएँ।शाम को जलाने वाले दीयों के लिए जगह खाली रखें।
- 3शाम को शिव की पूजा करें।जल या दूध से अभिषेक, बेलपत्र, फूल और अगरबत्ती।
- 4शिव के आगे त्रिपुर बाती जलाएँ।त्रिपुर यानी लंबी बाती। उसे घी में भिगोकर दीये में या खंभे पर जलाते हैं।
- 5दरवाज़े पर, आँगन में और तुलसी के पास दीये जलाएँ।मिट्टी के दीयों की कतार। उन्हें पर्दों, कपड़ों और बच्चों से दूर रखें।
- 6मंदिर जाकर जगमगाती दीपमाला देखें।शिव मंदिरों की पत्थर की दीपमालाएँ आज शाम जगमगाती हैं।
- 7पास में नदी या तालाब हो तो दीपदान करें।पत्ते या आटे के दीये छोड़ें, प्लास्टिक नहीं। गहरे पानी से दूर रहें और बच्चों को अकेला न छोड़ें।
- 8दान करें: अन्न, या एक दीया।ज़रूरतमंद को अन्न, या मंदिर में एक दीया। जितना हो सके।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
त्रिपुर बाती क्या है?
ऊँचे खंभे पर या दीये में जलाई गई लंबी बाती। शिव मंदिरों में और कई घरों में इसे शिव के आगे जलाते हैं।
क्या आज व्रत रखें?
महाराष्ट्र में यह मुख्य रूप से दीयों का दिन है; व्रत ज़रूरी नहीं। कुछ लोग शाम की पूजा तक व्रत रखते हैं।
क्या आज तुलसी विवाह कर सकते हैं?
हाँ। एकादशी से शुरू हुए तुलसी विवाह का आज आख़िरी दिन है।
नदी में दीये छोड़ते समय क्या ध्यान रखें?
पत्ते या आटे के दीये लें, घाट की सीढ़ी से ही छोड़ें, और बच्चों को साथ रखें। नदी न हो तो घर पर पानी की परात में दीया रखें।
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