त्योहार · वैशाख पूर्णिमा
बुद्ध पूर्णिमा 2026
वैशाख पूर्णिमा को बौद्ध परंपरा गौतम बुद्ध का स्मरण करती है: उनका जन्म, उनका ज्ञान और उनका महापरिनिर्वाण। महाराष्ट्र में विहारों में यह दिन बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है।
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संक्षिप्त जानकारी
- अन्य नामबुद्ध जयंती, वैशाख पूर्णिमा, वेसाक
- कहाँपूरा भारत, ख़ासकर महाराष्ट्र; और पूरा बौद्ध जगत
- किसकी पूजागौतम बुद्ध
- एक पंक्ति मेंगौतम बुद्ध का जन्म, ज्ञान-प्राप्ति और महापरिनिर्वाण, एक ही दिन स्मरण में।
बुद्ध पूर्णिमा, थोड़ा विस्तार से
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पर्व के बारे में
बौद्ध परंपरा में बुद्ध के जीवन के तीन बड़े क्षण इस पूर्णिमा से जुड़े हैं: लुंबिनी में जन्म, बोधगया में ज्ञान-प्राप्ति, और कुशीनगर में महापरिनिर्वाण।
बुद्ध ने मध्यम मार्ग बताया: न भोग में डूबना, न शरीर को कष्ट देना। उनकी शिक्षा चार आर्य सत्यों और आर्य अष्टांगिक मार्ग में बताई गई है।
आज का दिन चिंतन और शांति का है: शील का पालन, ध्यान, और करुणा से व्यवहार।
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सिद्धार्थ से बुद्ध
सिद्धार्थ गौतम शाक्य राजा शुद्धोदन और रानी माया के पुत्र थे। महल में बड़े होते हुए उन्होंने चार दृश्य देखे: एक बूढ़ा, एक बीमार, एक शव, और एक संन्यासी। दुःख क्यों है, यह प्रश्न उन्हें छोड़ता नहीं था।
एक रात वे महल छोड़कर निकल पड़े। वर्षों कठोर तप किया, इतना कि शरीर हड्डियों का ढाँचा रह गया। फिर भी उत्तर नहीं मिला। तब सुजाता नाम की लड़की की दी हुई दूध की खीर उन्होंने स्वीकार की, और शक्ति लौट आई।
फिर बोधगया में एक पीपल के नीचे वे बैठ गए: ज्ञान होने तक नहीं उठेंगे। वहीं वे बुद्ध बने। सारनाथ के मृगदाव में उन्होंने पहला उपदेश दिया, और लगभग अस्सी वर्ष की आयु में कुशीनगर में उनका महापरिनिर्वाण हुआ।
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महाराष्ट्र में और दूसरी जगह
महाराष्ट्र में यह दिन ख़ास है। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर की दीक्षाभूमि पर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने लगभग चार लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा ली। तब से बुद्ध पूर्णिमा महाराष्ट्र के लाखों बौद्धों का बड़ा दिन है।
विहारों में सामान्य से लंबा सूत्र-पाठ होता है, उपासक शील ग्रहण करते हैं और ध्यान करते हैं। थेरवाद परंपरा में आज सफ़ेद वस्त्र पहने जाते हैं।
कई जगह खीर बाँटी जाती है: सुजाता की बुद्ध को दी गई खीर की याद में। बुद्ध पूर्णिमा की सार्वजनिक छुट्टी डॉ. आंबेडकर ने क़ानून मंत्री रहते शुरू करवाई।
बोधगया के महाबोधि मंदिर में सजावट होती है और श्रद्धालु बोधि वृक्ष के नीचे प्रार्थना करते हैं। श्रीलंका, थाईलैंड और दूसरे देशों में यही दिन वेसाक के रूप में मनाया जाता है।
यह दिन कैसे मनाते हैं
संक्षेप में: विहार जाना, बुद्ध वंदना, त्रिशरण-पंचशील, धम्म का श्रवण और दान: यही आज का दिन है।
- 1पास के बुद्ध विहार जाएँ, या घर पर भगवान बुद्ध और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमा रखें।महाराष्ट्र के विहारों में भगवान बुद्ध के साथ बाबासाहेब की प्रतिमा होती है। कई जगह पंचशील ध्वज फहराया जाता है।
- 2सफ़ेद फूल चढ़ाएँ, और मोमबत्ती या दीया जलाएँ।फूल और दीये याद दिलाते हैं कि सब कुछ बदलता है। पर बुद्ध ने चढ़ावे से ज़्यादा आचरण पर ज़ोर दिया।
- 3बुद्ध वंदना करें, और त्रिशरण और पंचशील ग्रहण करें।नागपुर की दीक्षाभूमि पर आज दिन भर बुद्ध वंदना चलती है।
- 4धम्म देशना सुनें, धम्मपद पढ़ें, या कुछ देर शांत बैठकर ध्यान करें।कुछ उपासक आज पूर्णिमा पर अष्टशील का पालन करते हैं।
- 5दान करें: भोजनदान, खीर बाँटना, या किसी ज़रूरतमंद की मदद।सुजाता की दी हुई खीर की याद में कई जगह खीर बाँटी जाती है।
- 6दिन भर पंचशील का पालन करें: किसी को हानि नहीं, नशा नहीं, और मीठी वाणी।कई लोग आज शाकाहारी भोजन ही करते हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
त्रिशरण और पंचशील क्या हैं?
त्रिशरण यानी बुद्ध, धम्म और संघ की शरण जाना। पंचशील यानी पाँच शिक्षापद: हिंसा न करना, चोरी न करना, व्यभिचार न करना, झूठ न बोलना, और नशा न करना।
क्या आज व्रत रखें?
व्रत नियम नहीं है; शील का पालन ज़रूरी है। कुछ उपासक पूर्णिमा पर अष्टशील का पालन करते हैं, और कई लोग आज शाकाहारी रहते हैं।
क्या जो बौद्ध नहीं हैं, वे विहार जा सकते हैं?
हाँ। शांति और आदर से जाएँ, बुद्ध वंदना के समय शांत बैठें, और वहाँ की रीति का पालन करें।
बुद्ध पूर्णिमा और धम्मचक्र प्रवर्तन दिन में क्या फ़र्क है?
बुद्ध पूर्णिमा भगवान बुद्ध के जन्म, बुद्धत्व और महापरिनिर्वाण की याद है। धम्मचक्र प्रवर्तन दिन बाबासाहेब के नागपुर की दीक्षाभूमि पर धम्म दीक्षा लेने की याद है, और यह हर साल दीक्षाभूमि पर मनाया जाता है।
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